JHANSI KI RANI

हमारे एक ब्लोगर दोस्त मधुसूदन जी है जिनकी कविता – ‘झाँसी की रानी’ पढ़ कर बहुत अच्छी लगी जो मुझे खुद के ब्लॉग से शेयर कर रहा हूँ |

Madhusudan Singh

Image Credit : Google
बिजली जैसी चमक रही थी,हांथों में जिसकी तलवार,
झांसी की रानी थी सुनलो लक्ष्मीबाई की ललकार।
वीरों की धरती भारत में,वीर-धीर थी एक रानी,
मणिकर्णिका,लक्ष्मीबाई,नाम छबीली एक रानी,
भागीरथी माँ,पिता मोरोपंत की संतान अकेली थी,
शास्त्र,शस्त्र की शिक्षा,बचपन में ही उसने ले ली थी,
कानपूर की नानासाहेब की,मुँहबोली थी बहना,
बरछी,तलवारों के संग में बचपन से ही था रहना,
चूड़ी के बदले हाथों में जिसकी सजती थी तलवार,
झांसी की रानी थी सुनलो लक्ष्मीबाई की ललकार।1

बड़ी हुयी फिर हुयी सगाई,झांसी के महाराजा से,
मधुर मिलन लक्ष्मीबाई का गंगाधर महाराजा से,
मगर भाग्य में पुत्र नहीं,एक पुत्र हुआ वो रहा नहीं,
गोद लिया एक पुत्र मगर,दुर्भाग्य अभी भी टला नहीं,
ग्यारह साल हुए शादी का,पति का साया छूट गया,
झांसी के किले पर मानो,एक बिजली सा टूट पड़ा,
डलहौजी अंग्रेज ने दत्तक पुत्र को राजा ना माना,
हड़पनीति के आगे रानी का भी एक नहीं माना,

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मै तुम्हारा दोस्त हूँ।

Life iz Amazing

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उमंगों से भरा हूँ,
परिंदा मैं नया हूँ,
जोश से लबरेज हूँ,
मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।

घिरा हूँ मै दोस्तों से,
पर तुम बिन मैं अकेला हूँ,
घिरा हूँ मैं आँधियों से,
पर मैं मुहब्बत का दिया हूँ।

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हम-तुम ‘लेखक – रमानाथ अवस्थी’

हम-तुम
लेखक – रमानाथ अवस्थी 


जीवन कभी सूना न हो, कुछ मैं कहूँ कुछ तुम कहो,

तुमने मुझे अपना लिया, यह तो बड़ा अच्छा किया,
जिस सत्य से मैं दूर था, वह पास तुमने ला दिया !!

अब ज़िन्दगी की धार में, कुछ मैं बहूँ कुछ तुम बहो,

जिसका हृदय सुन्दर नहीं, मेरे लिए पत्थर वही,
मुझको नई गति चाहिए, जैसे मिले वैसे सही !!

मेरी प्रगति की साँस में, कुछ मैं रहूँ कुछ तुम रहो,

मुझको बड़ा-सा काम दो, चाहे न कुछ आराम दो,
लेकिन जहाँ थककर गिरूँ, मुझको वहीं तुम थाम लो !!

गिरते हुए इनसान को, कुछ मैं गहूँ कुछ तुम गहो,

संसार मेरा मीत है, सौंदर्य मेरा गीत है,
मैंने कभी समझा नहीं, क्या हार है क्या जीत है,

दुख-सुख मुझे जो भी मिले, कुछ मैं सहूँ कुछ तुम सहो !!

 

हिन्दी साहित्य में कुछ ऐसे लेखक और कवि हुये जिन्हे आज की पीड़ी ने कभी पढ़ा ही नहीं या उनको उतना सम्मान नही मिला जिसके वो हकदार थे अब उनके जाने के बाद हम उनकी याद मे उनकी एक कविता को अपने ब्लाग मे स्थान देखर खुद को बहुत ही गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ |

 

रात की बात,  ‘लेखक – रमानाथ अवस्थी’

रात की बात 
लेखक – रमानाथ अवस्थी


 

चंदन है तो महकेगा ही
आग में हो या आँचल में

छिप न सकेगा रंग प्यार का
चाहे लाख छिपाओ तुम
कहनेवाले सब कह देंगे
कितना ही भरमाओ तुम

घुँघरू है तो बोलेगा ही
सेज में हो या सांकल में

अपना सदा रहेगा अपना
दुनिया तो आनी-जानी
पानी ढूँढ़ रहा प्यासे को
प्यासा ढूँढ़ रहा पानी
पानी है तो बरसेगा ही
आँख में हो या बादल में

कभी प्यार से कभी मार से
समय हमें समझाता है
कुछ भी नहीं समय से पहले
हाथ किसी के आता है

समय है तो वह गुज़रेगा ही
पथ में हो या पायल में

बड़े प्यार से चाँद चूमता
सबके चेहरे रात भर
ऐसे प्यारे मौसम में भी
शबनम रोई रात भर
 

दर्द है तो वह दहकेगा ही
घन में हो या घानल में !

 

हिन्दी साहित्य में कुछ ऐसे लेखक और कवि हुये जिन्हे आज की पीड़ी ने कभी पढ़ा ही नहीं या उनको उतना सम्मान नही मिला जिसके वो हकदार थे अब उनके जाने के बाद हम उनकी याद मे उनकी एक कविता को अपने ब्लाग मे स्थान देखर खुद को बहुत ही गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ |

 

ख्याब – आखिरी पन्ना

आँखों में अब ख्वाब कहाँ
जब रातों में नींद नहीं
सपने भी अब देखे कैसे
जब अपना कोई चाँद नहीं ।

           खूब अँधेरी रातें हैं पर
           चाँद की चाँदनी है नहीं
           तारे गिन कर रात कटी
चाँद का दिलदार हुआ नहीं ।।

 

कब कहाँ किसके ख्याब हुए पूरे
कुछ तुम्हारे तो कुछ हमारे रहे अधूरे
मिलती कहाँ मंजिल सब को यहाँ
किसी के रास्ते रहे अधूरे
तो कुछ रास्तों के बिना रहे अधूरे ।।

 

 

ज़िंदगी – आखिरी पन्ना

लब अब मुस्कुराये कि कब मुस्कुराये
कि जमाना हो गए हमें मुस्कुराये,
नफरतों के बीज़ इस कदर बो दिए गए
कि ना कभी तुम मुस्कुराये ना हम मुस्कुराये ।।

बिरह की आग में अकेला ही जल रहा हूँ,
संग तेरे गुजरे वो लम्हें लिख रहा हूँ,
महफ़िल सजीं हैं इश्क वालों की,
जहाँ मैं अपनी दास्तां मोहब्बत कह रहा हूँ ।।

 

आओं याद शहर में चलते हैं
फिर बीते हुए पल को जीते हैं,
वक्त के साथ चल कर सब छूट गए
जो कभी आपने थे वो कहाँ गए,
जो सपने देखे थे वो टूट गए
अपने भी अपनों से रूठ गए,
अब लौट चले उन लम्हों में
जहाँ खुशियों के मेले लगते थे ।।
आवो याद सहर चलते हैं।।

इतना ही बहुत

जिंदगी ये है प्यारी बहुत,

जी लेने दे मुझको स्वाभिमान से,

कुछ ज्यादा मांगा नही तुमसे

जबकि ख्वाहिशें है अधूरी मेरी बहुत

कोई पूछे नही कभी मेरी खुशी,

मेरी चाहते पूछा तुमने इतना ही बहुत

किसने बांटे किसी के गम यहाँ,

तूने मेरे आँसूवों संग खेला इतना ही बहुत…!

Written by me on date 09/12/2017

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